4 औरतें हैं. भोपाल के छोटे से मोहल्ले में रहती हैं. हिंदू और मुसलमान धर्मों की हैं. ये चारों हमारे ही समाज का हिस्सा हैं जहां आदमियों को हमेशा औरतों से थोड़ा ज्यादा ही मिलता है. चारों की परिस्थितियां अलग हैं लेकिन चारों के सपने एक जैसे. ‘लिपस्टिक वाले सपने.’ इस घुटन से आजादी वाले सपने.

एक काल्पनिक किरदार ‘रोज़ी’ के जरिए फिल्म की लेखक और निर्देशक अलंकृता ने उन जिंदगियों में झांकने की हिम्मत की है जिनका समाज की नजरों में ना तो कोई अस्तित्व है ना ही कोई इच्छाएं.

‘फीमेल ओरिएंटेड’ फिल्म ने सेंसर बोर्ड की कुर्सी हिला दी थी क्योंकि वहां जो लोग बैठे हैं वो भी तो इसी पुरुषसत्तात्मक समाज का हिस्सा हैं.

कहानी: 3.5 स्टार

उषा जी यानी रत्ना पाठक शाह पूरे मोहल्ले की बुआ हैं. परिवार और समाज की नजर में 55 साल की उम्र में उनके भीतर प्यार और नजदीकियों की चाह मर जानी चाहिए थी. लेकिन बुआ जी की ऊपरी परत के भीतर एक ‘रोजी’ जवान हो रही है. उषा को इरोटिक साहित्य पढने का शौक है और वो अपनी फैंटसी उसी से पूरी करती हैं.

शीरीन यानी कोंकणा सेनशर्मा का पति असलम यानी सुशांत सिंह सऊदी में रहता है. हफ्ते-दस दिन के लिए जब भी इंडिया आता है, उसे प्रेग्नेंट करके चला जाता है. शीरीन अपनी इस ‘बच्चा पैदा करने वाली मशीन’ के इमेज से बाहर निकलना चाहती है. पति से छुपकर नौकरी करती है. पति कॉन्ट्रासेप्टिव का इस्तेमाल नहीं करता और बार-बार शीरीन की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ सेक्स करता है.

लीला यानी आहाना कुमरा अपनी शर्तों पर जीने वाली लड़की है. एक फोटोग्राफर से उसका अफेयर है. लेकिन उसकी मां चाहती है कि वो अरेंज मैरेज करके सेटल हो जाए.

रिहाना यानी प्लाबिता बोर्थाकुर हमेशा बुर्के में ही कैद रहती है. लेकिन उसके सपने उस बुर्के की घुटन को चीरकर बाहर निकलने के हैं. एक दोहरी जिंदगी जीते हुए वो जींस, शराब और माइली साइरस जैसे रॉकस्टार बनने के सपने देखती है.

मेरे बुर्का के नीचे लिपस्टिक

लिपस्टिक वाले सपने देखती लड़कियां

इन चारों औरतों की कहानियां आपस में जुड़ी हैं. एक आज के जमाने की लड़की, एक एंगेज्ड लड़की, एक शादीशुदा और एक बूढ़ी औरत. चार अलग-अलग जिंदगियां लेकिन चारों अपनी आजादी, अपनी शारीरिक जरूरतों और इमोशनल नजदीकियों के लिए तड़प रही हैं.

फिल्म के क्लाइमेक्स में दीवाली का मेला है. हर तरफ बम और पटाखों का शोर है और इन चारों की जिंदगियां पूरी तरह से उथल-पुथल हो चुकी हैं. जैसा की ‘रोजी’ ने कहा था, ‘आज की रात बहुत कुछ होने वाला था’.

हर तरफ से मुसीबतों से घिरी हुई ये चारों जब फटे हुए कपड़ों और किताबों के बीच बैठी हैं, तब भी इनकी आंखों में होते हैं, ‘नाउ ऑर नेवर वाले सपने’, ‘प्रेम और हवस वाले सपने’, ‘लिपस्टिक वाले सपने’.

उषा, शीरीन, लीला और रिहाना के आजादी फिल्म देखने वालों को अपनी आजादी लगती है.

मेरे बुर्का के नीचे लिपस्टिक

लिपस्टिक वाले सपने देखती लड़कियां

लेकिन कहीं-कहीं आप जब तक एक किरदार से जुड़ने लगते हैं, एक नई कहानी शुरू हो जाती है. लीला की मां का किरदार बहुत कम देर का था लेकिन उसके बारे में और बात की जानी चाहिए थी.

शीरीन अब अपने पति की गर्लफ्रेंड के घर जाकर उसे हड़काकर आती है तो मन में तालियां तो बजती हैं लेकिन एक अफसोस रह जाता है कि काश शीरीन ने ये सब अपने धोखेबाज पति से कहा होता.

कहानी में ताजगी है, खासकर रत्ना पाठक वाले हिस्से में. इसलिए कहानी के लिए हम फिल्म को 3.5 स्टार दे रहे हैं.

एक्टिंग: 4 स्टार

यह फिल्म एक से एक धुरंधर कलाकारों से लैस है. रत्ना पाठक शाह, कोंकणा सेन शर्मा, आहाना कुमरा और प्लाबिता बोर्थाकुर की एक्टिंग पर कहीं सवाल नहीं उठाया जा सकता.

विक्रांत मेसी की एक्टिंग हमेशा ही बेहतरीन होती है. बाकी के सह-कलाकार भी अपने रोल में बहुत अच्छे लगे हैं. एक्टिंग के लिए फिल्म को हम 4 स्टार दे रहे हैं.

सिनेमेटोग्राफी: 4 स्टार

यह फिल्म का एक मजबूत पक्ष है कि इसकी पूरी फील फिल्म की कहानी और कलाकारों की जिंदगी को सपोर्ट करती है.

‘बुर्का’ सिर्फ काले कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है बल्कि एक सोच है जो औरतों को दबा कर रखती है. इसी घुटन को फिल्म में छोटे, अंधेरे घरों और कमरों से दिखाया गया है. सवारी गाड़ियों में भी ठूंस कर बैठे लोग और भीड़भाड़ देखकर ही सांस लेना मुश्किल लगता है.

स्विमिंग पूल में तैरती उषा, जींस पहने रिहाना, वैक्सिंग करवाती शीरीन और अपने अब्यूसिव बॉयफ्रेंड के सामने अपने मंगेतर को किस करती लीला को उन पलों में देखना बहुत सुकून देता है.

मेरे बुर्का के नीचे लिपस्टिक

लिपस्टिक वाले सपने देखती लड़कियां

एडिटिंग का पक्ष थोड़ा सा कमजोर है. सिनेमेटोग्राफी के लिए फिल्म को हम 4 स्टार दे रहे हैं.

कुल मिलाकर: 3.5 स्टार

इस फिल्म में वो सब कुछ है जो आपको असहज कर सकता है. मास्टरबेट करती लड़कियां, सेक्स के लिए पहल करती लड़कियां, गाली देती, डबल मीनिंग बातें करती, अपनी आजादी की मांग करती लड़कियां और पति के रवैये से थककर सेक्स के लिए मना करती लड़कियां.

लेकिन इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो मनगढ़ंत हो. ये समाज की हकीकत है, ये वो सबकुछ है जो लड़कियां देखना, कहना और करना चाहती हैं.

अगर आप असहज होकर सच्चाई देखने के लिए तैयार हैं तो फिल्म देखें वरना अपनी सोच के विकसित होने का इंतेजार करें. कुल मिलाकर हम इस फिल्म को 3.5 स्टार दे रहे हैं.

पढ़ें हिंदी समाचार ऑनलाइन और देखें लाइव टीवी न्यूज़18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी हिन्दी में समाचार.

.



Source link

Leave a Reply